मेरे बारे में

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The only thing I really wish to do with my life is to inspire someone. I want to touch someone’s life so much that they can genuinely say that if they have never met me then they wouldn’t be the person they are today. I want to save someone; save them from this cold, dark and lonely world. I wish to be someone’s hero, someone that people look up to. I only wish to make a change, even if it’s a small one. I just want to do more than exist.

सोमवार, 20 मई 2013

मै फिर उस समय में लौटना चाहता हूँ ...............

मै फिर उस समय में लौटना  चाहता हूँ ................

जब ऊंचाई पर जाने का मतलब होता था सिर्फ झूले पर खूब ऊपर तक जाना .............

जब सिर्फ मेरी माँ ही मेरी हीरो हुआ करती थी .................

जब पिता के कंधे दुनिया की सबसे ऊँची जगह होते थे .................

जब मेरे सबसे बड़े दुश्मन मेरे अपने भाई बहिन हुआ करते थे और हम रोज़ लड़ाई झगडा करते थे ............

मै फिर उस समय में लौटना  चाहता हूँ ................

जब टूटने वाली चीजें सिर्फ खिलौने हुआ करते थे ................

जब सिर्फ एक चीज़ से हमें तकलीफ हुआ करती थी और वो थे छिले हुए घुटने ............

जब टाटा कहने का मतलब सिर्फ अगले दिन तक ही होता था ...............

जब पढ़ने का कोई समय नहीं होता था मगर खेलने का एक निश्चित समय हुआ करता था ............

मै फिर उस समय में लौटना  चाहता हूँ ................

जब नहाते समय पानी के टब में हम कागज़ की नाव चलाया करते थे ...............


जब एक पल में रोते थे और अगले ही पल में हँसने लगते थे ..........

जब हम स्कूल जाने से रोज़ घबराया करते थे ...........

जब रोज़ नए दोस्त हम बनाया करते थे ...........

हाँ, मै फिर उस समय में लौटना  चाहता हूँ .............

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

खंडहर



                                                                कल थी आलीशान इमारत ,
                                                                आज  वहां  सिर्फ  खंडहर  हैं ।

                                                                रोज़ सुबहो-शाम ज़हाँ पर,
                                                                पंछी   चहका   करते   थे ।

                                                                 भंवरे की गुंजन से सारे, 
                                                                 फूल वो महका करते थे ।

                                                                 किस्से कई सुने थे हमने,
                                                                 तराने कई सुने थे हमने ।

                                                                 इस ईमारत के गलियारों में,
                                                                 अफसाने कई सुने थे हमने ।

                                                                छाई  है  वहां  आज  ख़ामोशी,
                                                                और दूर तक पसरा सन्नाटा है ।

                                                                 उठते हुए देखो वो कैसे ,
                                                                 धूल   के   बवंडर   हैं ।

                                                                 कल  थी आलीशान  ईमारत,
                                                                 आज  वहां  सिर्फ  खंडहर  हैं ।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

ख्वाबों में गुज़रा हुआ कर कल नज़र आएगा .

रखो हौसला , वो मंज़र भी आएगा ,
प्यासे के पास चलकर, समंदर भी आएगा .

थक कर न बैठ, ऐ मुसाफिर ,
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मज़ा भी आएगा .

जिंदगी की राहों में, जब कभी आँखें बंद करोगे ,
तो ख्वाबों में गुज़रा हुआ कर कल नज़र आएगा .

नज़रें दुनिया की, जब कभी तुम्हें तन्हा छोड़ेंगी ,
साथी तुम्हें कोई, दूसरा मिल जाएगा .

मौसम ने ये कैसी, ली है करवट ,
लगता है जैसे, कोई तूफां आएगा .

कश्ती को अपनी संभाल, ऐ मांझी ,
वरना उसे तूफां, बहा ले जायेगा .

बाजारों में रोज़, बिकते हैं ज़ज्बात ,
आज फिर कोई नया खरीदार आएगा .

सारें ज़हां में लोग रहें हंसी-ख़ुशी .
उम्मीद है "विजय" ऐसा भी कोई पल आएगा .

ये ज़िन्दगी एक खेल है और हम सब कठपुतली ,
यहाँ रोज़ एक नया खेल खेला जायेगा .   

बुधवार, 25 जनवरी 2012

जी चाहता है......

बहुत रह लिए ज़मीं पर अब ,
आसमां में उड़ने को जी चाहता है !!

बहारें जब छा जाती हैं चमन में ,
गीत कोई गुनगुनाने को जी चाहता है !!

कभी दायरों में सिमट जाती है जिंदगी ,
कभी सारे बंधन तोड़ने को जी चाहता है !!

कभी दुश्मनों पर आता है गुस्सा ,
कभी उन्हें दोस्त बनाने को जी चाहता है !!

हर पल ऊपर वाले का नाम आता है जुबां पे ,
कभी उसके पास जाने को जी चाहता है !!

कभी ये दुनिया लगती है अच्छी ,
कभी जिंदगी से भाग जाने को जी चाहता है !!

याद उनकी कभी जाती नहीं दिल से ,
जिन्हें अपना बनाने को जी चाहता है !! 

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

इन्तजार.........

जवां रात के सीने पे ............
दुधिया आंचल मचल रहा है.......
किसी हसीं ख्वाब की तरह......
हंसीं फूल....
हंसीं पत्तियां......
हंसीं शाखें ........
लटक रही हैं ..........
पेड़ों से........
किसी नाजनीं की तरह ........
आज फिर वो हंसीं लम्हें मुझसे मिलने आयें हैं.........
तेरे होठों पर तबस्सुम की हल्की सी लकीर..........
मेरे ख्वाब में रह-रह कर झलक रही है ...........
तेरे कांपते होंठों की जादू भरी हंसीं.....
मेरे सीने में कोई जाल बुन रही है.........
तू नज़रें झुकाय.....
खुद अपने कदमों की आहट से झेंपते हुए........
डरते हुए........
फूल चुन रही है.......
मै धड़कते दिल से........
खुदा से फरियाद कर रहा हूँ .........
कि मेरे आरजू के कँवल .......
खिल कर फूल हों जाएँ .........
दिले- नज़र की दुआएं मेरी कबूल हों जाएँ .........
जुबां मेरी खुश्क हैं ........
आवाज रूकती सी जाती है........
न जाने आज मै क्या बात कहने  वाला हूँ........
तुम अपनी धुन में फूल चुनती जा रही हो.........
दबे सुरों में शायद........
कोई गीत गुनगुना रही हो......
रोज़ की तरह आज भी तारे........
सुबह की गर्द में खो रहे हैं ...........
ये तन्हाई की घड़ियाँ ........
किसी नागिन की तरह मुझे डस रही हैं........
जहां में हुस्न की ठंडक का असर हो रहा है.........
दूर वादियों में दूधिया बादल ...........
झुक कर पर्वतों को प्यार कर रहे हैं.........
दिल में नाकाम हसरतों को लिए........
हम तेरा इन्तजार कर रहे हैं......

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

ख्यालों के गुल


Image: Evgeni Dinev / FreeDigitalPhotos.net
फूलों की घाटी ,
झरनों की वादियाँ ,
बर्फ की बारिश..........
ढेरों चित्र आँखों में कैद थे........
तुम्हारे साथ गुज़ारा,
हर लम्हा दिल की जागीर था.....
यादों का आलम यह था कि,
रेत पर तुम्हारा नाम कब लिख दिया ,
पता ही न चला.........
फिर उसे सीपियों से सजाया और ,
अपने आँचल में उसे छुपा लिया.........
शायद यही चाहत है,
कि, ख्यालों के गुल ,
किताब में उतर आये हैं ........... 

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

इ ससुरा मोबईल्वा...........

                             कल शाम को बैठे-बठे अचानक हमारा घूमने का मूड बन गया. सोचा की काफी दिन हो गए, पैदल घूमे हुए. क्या है कि इधर कई दिनों से मोटर-साईकिल के साथ हमारा फेविकोल का जोड़ बन गया था. जहाँ भी जाते, मोटर-साईकिल से ही जाते थे .  आस-पास भी कहीं काम होता तो मोटर-साईकिल की पहले याद आती .
                              इसलिए हमने सोचा कि कहीं अपना ख्याल बदल न जाय , सो तुरंत ग्यारह नंबर की बस पकड़ चल दिए बाज़ार की ओर तफरीह करने. अपने आस-पास के वातावरण का आनंद लेते हुए हम टहलते रहे.
                              टहलते-टहलते अभी कुछ ही दूर तक पहुंचे थे कि सामने से मिश्राजी आते हुए दिखाई पड़ गए . मन में हमने सोचा कि चलो आज इन्हीं को खोदा जाय . हमने उन्हें जोर से आवाज लगाई .
                             "अरे मिश्राजी ,प्रणाम , कैसे हैं ?"   
                              मिश्राजी ने हमें देखा तो उनके चेहरे पर घडी के विज्ञापन की तरह , सवा दस , बजने लगे . मिश्राजी हमारे परिचित हैं . काफी मिलनसार एवं मजाकिया  स्वभाव के व्यक्ति हैं . उम्र लगभग पचपन के करीब होगी . हमारे पास आये तो मुस्कुराते हुए पूछने लगे .
                             "काय दादू , कैसन हो ."   और पूछने के बाद आसमान की ओर देखने लगे .
                             हमने पूछा ,"ऊपर क्या देख रहे हैं , आदरणीय ?"
                             "देख  रहा हूँ दादू...... कि आज इ सूरजवा किधर से उगा है . आप और आज पैदल ? गडिया बेच दई का , या आपकी  गड़िया  भी धन्नो के टंगवा के साथ भाग गई ?"
                             हमने भी खीसें नपोरते हुए जवाब दिया,"अरे नहीं भाईसाब , बस  आज यूँ ही घूमने की इच्छा हुई..........तो निकल आय घूमने .......आप सुनाइए , काफी दिनों बाद नज़र आ रहें हैं . कहीं बाहर गए थे क्या ?"
                             "हाँ दादू , तनक इलाहबाद गए रय , गंगा नहाई के लाने . हमरी मिश्राइन कई  दिना से पीछे लगी रई कि गंगा नहाई का है , जई से हमने सोची कि मिश्राइन का गंगा-दर्शन करवाई दई . फिर पता नई कब जाना होत है ." 
                             "अच्छा , तो हो गये गंगा मैया के दर्शन ?"
                             " अरे दर्शन क्या , हम तो बड़े परेशान भय रय उते ."
                             " क्यों मिश्राजी , ऐसी क्या बात हो गयी थी ."
                             "अरे उधर हमरी मिश्रइन खो गयी रई ,"
                             " मिश्राइन खो गयी थी...?...... कुछ समझा नहीं मिश्राजी ?
                             " अरे अब का बतई , वो का भओ कि हम दोनों पहुंचे संगम . नहाना-धोना , दर्शन सब से निपटे तो हमरी पान खाई की इच्छा भई . हमने मिश्राइन से कई की हम आत हैं तनक पान खाई के , जब तक तुम तैयार होवो .इतन बताय के हम आ गए ऑटो-स्टैंड के पास . पान वगैरह खाई के जब हम पहुंचे वापस ,तो देखा की हमरी मिश्राइन गायब . वो क्या था कि तैयार होकर मिश्राइन ने सोची , कि मई पान खाय के लाने ऑटो-स्टैंड तो आया हूँ , और फिर उतनी दूर वापस जाऊंगा , सो खुदई  पहुँच गयी  रइ ऑटो-स्टैंड , सामान उठाई के . अब वो हमका ढुंढत  रइ और हम उका . हम दोनों के पास मोबईल्वा था , मगर ससुरा समय पर उ भी न लगे . काफी देर तक हम दोनों  परेशान होत रहे . वो तो भला हो पांडे जी का , हमरे परिचित , जो हमें उंही मिल गए रहे . हमने  उन्हें अपनी समस्या बताई . उन्होंने हमसे  मोबईल्वा लिया और नंबर देख कर कहेन लगे कि हम बिना जीरो लगाय , नम्बर लगात रहे . वो क्या है कि रोमिंग  में जीरो लगान पड़े न . जब जीरो लगा कर हमने नंबर लगाया तो ससुरा झट से लग गओ . और तब जाकर हमरी मिश्राइन हमें  मिली ."
                               " हमने कहा ," वाह मिश्राजी , तो मोबाईल ने आपको धोखा दिया  और फिर मोबाइल ने ही आपको मिलाया भी ."  
                                "हओ दादू , इ मोबईल्वा भी समय पड़ने पर धोखा देत है , हम तो सचमुच घबराय गय रहे ."
                                इतना कहकर मिश्राजी मुस्कुराने लगे.

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मुझे अब भी मोहब्बत है..........


मुझे अब भी मोहब्बत है
                अपने हाथों की सब उँगलियों से .
                             न जाने किस ऊँगली को थाम कर,
                                         मेरी माँ ने मुझे
                                                     चलना सिखाया होगा........... 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

वो ख्वाब फिर, अधूरे रह गुए .........

वो ख्वाब फिर ,
        अधूरे रह गए !!
सोचा था, 
        वो आयेंगे ,
राह पे उनकी ,
        हम चाँद-तारें बिछायेंगे ,
फूलों से उनकी ,
        सेज को सजायेंगे ,
वो न आये ,
इंतज़ार हम करते रह गए !!
दिल के ज़ज्बात ,
        दिल में ही रह गए !!

वो ख्वाब फिर, 
          अधूरे रह गुए !!


सोचा था,
         वो आयेंगे ,
ढेर सारे पल ,
         साथ बिताएंगे ,
उन पर हम अपनी ,
         जान लुटाएंगे ,
वो न आये ,
हसरतों को हमारी,
          वो रुसवा कर गए !!
न जाने वो ,
          कहाँ खो गए !!

वो ख्वाब फिर ,
          अधूरे रह गए !! 

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

रेल को अपना निशाना बनाना छोड़ें


                             आंध्र प्रदेश में पृथक तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आंदोलनरत तेलगांना संयुक्त कार्रवाई समिति ने बुधवार से तीन दिनों तक रेलमार्ग अवरूद्ध करने का फैसला किया है, जिससे 100 से अधिक रेलगाड़ियां स्थगित कर दी गई हैं। गौरतलब है कि पिछली बार 24 और 25 सितम्बर को दो दिनों के लिए रेलमार्ग अवरूद्ध किए गए थे, जिसकी वजह से 72 एक्सप्रेस रेलगाड़ियों और 264 सवारी रेलगाड़ियों को रद्द किया गया था।
                           
                            वाह रे देश के नेता !!!..... अपना मतलब साधने के लिए क्या तुम्हें सिर्फ रेल गाड़ियाँ ही दिखाई देती हैं? सत्ता की रोटियां सेकने के लिए रेल रोको आन्दोलन ही तुम्हें दिखता है ?
                           ये इस देश की विडंबना ही है कि जिसे भी अपनी आवाज बुलंद करनी होती है, वो रेल संचालन अवरुद्ध करने पर उतारू हो जाता है . अभी कुछ समय पहले की बात को ही लीजिये , जब गुर्जर आन्दोलन हुआ था , तब भी इन नेताओं को रेलवे ही की याद आई थी .
                         जिसे देखो अपना गुस्सा रेल पर उतरना शुरू कर देता है.  इन लोगों को ये चिंता नहीं होती कि रेल रोकने से आम जनता को कितनी तकलीफ होती है . इन आंदोलनों कि वजह से रेलवे को कितना नुकसान उठाना पड़ता है .  रेल अगर न चले तो रोज़ इस देश को करोड़ों रुपयों का नुकसान में होता है. ये सारी चीजें इनको नहीं दिखाई देती .  दिखाई देता है तो बस, अपना मतलब . 
                         ऐसे खुदगर्ज़ लोगों से मेरी विनती है कि रेल को अपना निशाना बनाना छोड़ें और कुछ इस देश का ख्याल करें . 

सोमवार, 5 सितंबर 2011

खुबसूरत पंक्तियाँ........

विज्ञानं कहता है "जीभ पे लगी चोट सबसे जल्दी ठीक होती है,
और....ज्ञान कहता है "जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती."

जिंदगी की आधी शिकायतें ऐसे ही ठीक हो जाएँ
अगर लोग......"एक दूसरे के बारे में बोलने की जगह, 
एक दूसरे से बोलना सीख जाएँ ."


हमारा अच्छा समय दुनिया को बताता है कि हम क्या हैं,
और हमारा बुरा समय हमें बताता है कि दुनिया क्या है.......


रास्ते में आने वाले पत्थरों से घबराने की बजाय हिम्मत से उन्हें पार करें,
ये पत्थर मील के पत्थर बन जायेंगे........

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

मै वो शख्स हूँ जिसने यहाँ इंसान बदलते देखा है

इस शहर में लोगों का इमान बदलते देखा है ,
मै वो शख्स हूँ जिसने यहाँ इंसान बदलते देखा है !!

लोग तरसते रह जाते हैं एक आशयाने के लिए ,
मैंने तो  उन्हें रोज़ एक मकान बदलते देखा है !!

लोग वादा करते हैं जिन्दगी भर साथ निभाने का,
मैंने तो जनाजे में भी लोगों को कंधे बदलते देखा है !!

क्यों मायूस होते हो,जरा-जरा सी बातों पर ,
मैंने तो तूफानों में भी चिराग जलते देखा है !!

पानी की एक-एक बूँद को यहाँ लोग तरसते हैं,
वहां मैंने समंदर पर बादलों को बरसते देखा है !!

लोग तो शरीफ होने का बस दम भरते हैं ,
मैंने लोगों को गिर-गिर सँभलते देखा !!

क्यों, उन्हें अपने होने का इतना गुरुर है ,
मैंने तो पहाड़ों को भी टूट के बिखरते देखा है !!

रविवार, 28 अगस्त 2011

वो तस्वीर

एक रोटी नहीं दे सका
कोई......
उस मासूम को 
लेकिन.......
वो तस्वीर....... 
लाखों में बिक गयी, 
जिसमें  
रोटी के बगैर.......
बच्चा 
उदास था....... 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

वो मज़ा कुछ और होता है.........







बारिश में भीगने का , मज़ा कुछ और होता है ,
चाहत में मर-मिटने का, मज़ा कुछ और होता है !!

याद जब आये उनकी तो, दिल को मनाने की खातिर,
तन्हाईयों में पीने का, मज़ा कुछ और होता है !!

ये आरज़ू थी हमारी, उन्हें अपनाने की लेकिन,
वो कहते है, हमें सताने का, मज़ा कुछ और होता है !!



अपनों पर सितम तो, हर कोई ढाता है, लेकिन ,
दूसरों पर सितम ढाने का, मज़ा कुछ और होता है !!



पल जीवन के, जो गुज़र जाते हैं, यादें वो पीछे छोड़ जाते हैं,
उन यादों के सहारे जीने का, मज़ा कुछ और होता है !!

मंझधार में तो हर कोई,डूब जाता है लेकिन, 
किनारों पर डूबने का ,मज़ा कुछ और होता है !!   
                           

रविवार, 31 जुलाई 2011

समस्या का समाधान.....

                                काफी समय पहले की बात है. ब्रह्माजी को एक बार छुट्टी की जरूरत पड़ी. वे विष्णु जी के पास पहुँचे. विष्णुजी ने उन्हें जाने की इजाजत देते हुए कहा की वे अपनी जगह किसी और को नियुक्त करके ही छुट्टी पर जाएँ.  
                               अब ब्रह्माजी ने सोचा कि किसको ढूंढे जो उनकी जगह काम कर सके. आखिर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मिल ही गया. वह व्यक्ति देखने में ही काफी आलसी लग रहा था. उस समय भी वह सो रहा था. ब्रह्मा जी  ने उसे जगाया और उसे अपनी समस्या बताई. वह व्यक्ति मान गया और पूछा कि उसे करना क्या पड़ेगा.
                               ब्रह्मा जी उसे अपने साथ  एक जगह ले गए, जहाँ बहुत सी मिटटी पड़ी थी. ब्रह्मा जी ने उस व्यक्ति से कहा,"देखो, ये जो मिटटी पड़ी है ना, बस इस मिटटी के तीन-चार पुतले रोज़ बना कर धरती पर फेकना है. और कोई काम नहीं है."
                                उस व्यक्ति ने सोचा कि वाह, काम तो कुछ भी नहीं है. रोज़ सिर्फ तीन-चार पुतले बनाओ और फिर तान के सो जाओ, बहुत बढ़िया. उसने हामी भर दी.
                               उसके हामी भरते ही ब्रह्मा जी उसे अपना कार्यभार सौंप कर चले गए. करीब एक हफ्ते बाद जब वो छुट्टी से वापस लौटे तो देखा कि वहां की सारी मिटटी गायब है, और वह व्यक्ति आराम से सो रहा है. उन्होंने तुरंत उसे जगाया और पूछा,"क्यों यहाँ की सारी मिटटी कहाँ गयी?"
                               उस व्यक्ति ने जवाब दिया,"प्रभुजी, वो तो मैंने सोचा की कौन रोज़-रोज़ तीन-चार पुतले बनाएगा ,इसलिए मैंने एक ही दिन में सारे पुतले बना कर धरती पर फ़ेंक दिए, और बाकी दिन आराम से सो रहा था. मगर आप इतना घबरा क्यों रहे हैं.?"
                              ब्रह्मा जी ने अपना सर पीटते हुआ कहा,"तुमने तो पूरा कचरा कर के धर दिया. सारी मिटटी के पुतले बनाने की क्या जरुरत थी ? अब उधर धरती पर जनसँख्या बढ गयी है. इतने सारे लोगों के खाने-रहने का इंतजाम करना पड़ेगा. और तुमने पुतले बनाये भी तो सब उलटे-सीधे हैं. खुद ही देख लो, किसी का हाथ नहीं है, किसी का पैर नहीं है, किसी का दिमाग नहीं है, सब के सब आड़े तिरछे बने हैं. तुमने तो काम और बढा कर रख दिया है."
                   काफी देर तक ब्रह्मा जी समस्या का हल ढूंढ़ते रहे .जब उनकी समझ में कुछ नहीं आया तो वे पहुँच गए विष्णुजी के पास . उन्हें अपनी समस्या बताई . विष्णु जी भी उनकी समस्या सुन कर सोच में पड़ गए . उन्हें भी कुछ नहीं सुझा.
                           इतने में नारद मुनि का आगमन हुआ. नारदजी के पूछने पर विष्णुजी ने उन्हें भी समस्या सुना दी. समस्या सुनते ही नारदजी ने कहा ," अरे,बस इतनी सी बात है, चलिए मै आपको इस समस्या का हल बताता हूँ . धरती लोक में एक नया सरकारी विभाग चालू करिए और सभी को उसमे भर्ती करवा दीजिये . बस ,  आपकी समस्या ख़त्म ."
                           विष्णुजी और ब्रह्माजी , दोनों को उनकी बात पसंद आती है . धरतीलोक पर एक नया विभाग चालू किया जाता है , जिसका नाम रखा जाता है  "रेलवे  विभाग " और सभी को उसमे भरती कर दिया जाता है. 

सोमवार, 18 जुलाई 2011

सुबह 07.30 बजे की ट्रेन..........

                                   आज वो फिर लेट हो गया था. ट्रेन छूटने में कुछ ही समय बाकी रह गया था. जल्दी-जल्दी स्टैंड में अपनी स्कूटर खड़ी कर, वह स्टेशन की ओर दौड़ पडा. चलते-चलते घडी पर नजर दौड़ाई तो देखा कि सिर्फ एक मिनट रह गया है, ट्रेन छूटने में. उसने सोचा कि आज तो शायद ट्रेन छूट ही जाएगी. जेब से फुर्ती में मोबाइल निकाल कर उसने अपने दोस्त को कॉल लगाई.
                                  "हेलो......सुरेन्द्र....?.... हाँ मै दीपक बोल रहा हूँ.......कहाँ हो.....?"
                                  "हाँ....दीपक......मै ट्रेन में हूँ.....पीछे से तीसरे डिब्बे में......जल्दी आओ ट्रेन स्टार्ट हो गयी है......."
                                  "अरे, स्टार्ट हो गयी.......ऐसा करो, चेन खींच दो........मै स्टेशन के बाहर हूँ.....बस आ रहा हूँ......"
                                  स्टेशन से लगभग आधी बाहर निकल चुकी ट्रेन, चेन खिंचने की वजह से खड़ी हो गयी. क़रीब पाँच मिनट बाद जब ट्रेन फिर चली, तो तब तक दीपक ट्रेन में पहूँच चुका था.
                                  ट्रेन में पहुँच कर उसने राहत की साँस ली. अगले स्टेशन पर उतर कर, वह पीछे से तीसरे डिब्बे में पहुँच गया, जहाँ कि उसका दोस्त बैठा था. दोनों आपस में इधर-उधर की बातें करने लगे. 
                                  यह उनका रोज़ का रुटीन बन गया था. रोज़ सुबह 07.30 बजे की ट्रेन से वे आना-जाना करते थे. पास ही के एक छोटे से शहर में एक प्रायवेट कम्पनी में वे नौकरी करते थे. कई साल हो चुके थे उन्हें, अत: अब तो उन्हें आदत पड़ गयी थी, इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी की.
                                  आज रोज़ के मुकाबले कुछ ज्यादा ही भीड थी ट्रेन में. बातें करते-करते दीपक की नजर एक बुजुर्ग सज्जन पर पडी, जो काफी देर से जगह ना होने के कारण, खडे हुऐ थे. वे काफ़ी बेचैन भी नजर आ रहे थे. उनकी उम्र का लिहाज़ कर दीपक ने उन्हें अपनी सीट पर बैठा लिया. वे बुजुर्ग सज्जन उसे दुआएँ देते हुए बैठ गए. दीपक ने बातें करते हुए उनसे परेशानी का कारण पूछ लिया. 
                                  बुजुर्ग ने कहा,"क्या बताऊँ बेटा, घर से जल्दी में निकला था, स्टेशन के लिए, जब टिकट खरीदने के लिए टिकट-खिड़की पर गया तो वहाँ काफी भीड़ थी. इधर ट्रेन भी आकर खड़ी थी. कही ट्रेन न छूट जाय, इसलिए बिना टिकट लिए ही ट्रेन में बैठ गया हूँ. अब तो यही सोच रहा हूँ कि कोई टी.सी. ना पकड़ ले."
                                  "कोई बात नहीं दादा, आज ट्रेन में कोई टी.सी. नहीं दिखाई दिया मुझे. कोई नहीं पकडेगा, शांति से बैठिये. वैसे आपको उतरना कहाँ है."
                                  "बस अगले स्टेशन पर ही उतरना है मुझे बेटा, लेकिन उतरने के बाद गेट पर भी तो टी.सी. टिकट पुछेगा."
                                  दीपक ने मुस्कुराते हुए कहा,"चलिए दादा, आज आपको गेट से बाहर निकलवाना मेरी जिम्मेदारी है, मुझे भी अगले स्टेशन पर ही उतरना है, बस आप मेरे पीछे-पीछे चलते रहना, कुछ फासले पर, ठीक है?"
                                  कुछ देर बाद ट्रेन अगले स्टेशन रुकी. दीपक ने उन बुजुर्ग व्यक्ति को अपने पीछे आने का इशारा कर गेट की ओर चल दिया.
                                  गेट पर टी.सी. यात्रियों की टिकट चैक कर रहा था. दीपक धीरे-धीरे चलते हुए गेट पर पहुँचा. जैसे ही टी.सी. ने दीपक से टिकट दिखाने को कहा, उसने बाहर की ओर दौड़ लगा दी. टी.सी. ने दीपक को भागते हुए देखा, तो पीछे से आवाज लगायी, और उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ा.
                                  अब टी.सी. के गेट से हटते ही बुजुर्ग सज्जन फुर्ती में गेट से बाहर निकल गए. उधर कुछ दूर पर टी.सी. ने दीपक को पकड़ लिया, और उससे टिकट मांगी. दीपक ने चुपचाप जेब से मंथली सीज़न टिकट निकाल कर टी.सी. के हाथ पर रख दी. टी.सी. ने टिकट चैक करते हुए पूछा,"जब तुम्हारे पास टिकट थी, तो फिर भागे क्यों थे.?"
                                 दीपक ने टिकट को अलट-पलट कर देखते हुए कहा,"भाई साब, इस टिकट पर तो ऐसा कहीं नही लिखा कि भागना मना है."
                                 टी.सी ने दीपक को घूर कर देखा और फिर बडबडाता हुआ गेट की तरफ़ चला गया.दीपक ने मुस्कुरातें हुए बुजुर्ग व्यक्ति की तरफ़ देखा, जो तब तक बाकी लोगों के साथ उनके पास आ चुके थे. वे उसे दुआएँ देने लगे और धन्यवाद देते हुए चले गए.दीपक भी गुंनगुनाता हुआ अपने आफिस की तरफ चल दिया.

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

बारिशों के मौसम में......



कुछ ख्वाब से उभर आए है,                        
बारिशों   के   मौसम    में .


               अरमां दिल में जग आए है ,
               बारिशों   के   मौसम   में .

                           ज़हन में वो याद आए हैं,
                           बारिशों  के  मौसम  में .


                                               आंखे  भीग  आई   हैं ,
                                               बारिशों के मौसम में .


                                                          पल जो कल साथ बिताये थे,
                                                          बारिशों    के    मौसम   में .


                                                                   आज फिर नज़रों में छाए हैं,
                                                                   बारिशों   के   मौसम   में .


                                                                                फूलों पर बिखरी है शबनम
                                                                                बारिशों   के   मौसम   में .


                                                                                                   बूँदे बनी हैं आज दुल्हन
                                                                                                   बारिशों   के   मौसम   में 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

रेलवे की नई ई-टिकट सेवा जल्द

भारतीय रेलवे अपनी ई-टिकट सेवा शुरू करने वाला है. इसमें ट्रैवल एजेंट के लिये जगह नहीं होगी और यह सिर्फ व्यक्तिगत इस्तेमाल करने वालों के लिये आरक्षित होगी.

आईआरसीटीसी की ई-टिकट से इतर भारतीय रेल की इस नयी सेवा में ट्रैवल एजेंटों और व्यावसायिक संगठनों की कोई भूमिका नहीं होगी. वेबसाइट पर सिर्फ व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं को ही टिकट खरीदने की अनुमति होगी.

आईआरसीटीसी सेवा में ट्रैवल एजेंटों पर टिकटों की बुकिंग कराकर उसे ऊंची कीमतों पर बेचने का आरोप है.

लोगों की नाराजगी को देखते हुए रेलवे ने आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर व्यस्ततम समय में ट्रैवल एजेंटों को तत्काल टिकट की बुकिंग से रोक दिया है.

नयी रेलवे ई-टिकट सेवा के तहत ग्राहकों को सेवा प्राप्त करने के लिये पहली बार खुद को पंजीकृत करने की जरूरत होगी. पंजीकरण नि:शुल्क होगा.

शुरू में प्रति यूजर आईडी पर प्रति महीने अधिकतम आठ लेन-देन की अनुमति होगी.  शयनयान श्रेणी के लिये प्रति टिकट पांच रुपये सेवा शुल्क लगेगा जबकि अन्य श्रेणियों के लिये प्रति टिकट दस रुपये होगा.

आईआरसीटीसी शयनयान श्रेणी के लिये प्रति टिकट दस रुपये और अन्य श्रेणियों के लिये 20 रुपये प्रति टिकट शुल्क लेती है.

नयी सेवा www.indianrailways.gov.in पर उपलब्ध होगी.

सेवा रात साढ़े 12 बजे से रात साढ़े 11 बजे तक (करीब तेईस घंटे) उपलब्ध होगी और सिर्फ बीच के एक घंटे के लिए बंद रहेगी.

परियोजना की शुरुआत इस उद्देश्य से की गई है कि लोगों के लिये एक ही विंडो इंटरफेस पर सभी सेवाएं एवं सूचनाएं उपलब्ध हो जाएं.

इस सेवा से यात्रियों के लिए टिकट बुक कराने के अन्य रास्ते खुल जाएंगे जबकि आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर दबाव कम होगा.

मोबाइल फोन पर भी टिकट बुक कराने की सेवा देने का प्रस्ताव है.
सेवा लेने के इच्छुक और इंटरनेट रखने वाले ग्राहकों को भारतीय रेल की वेबसाइट से मोबाइल फोन पर मोबाइल टिकट आवेदन डाउनलोड करना होगा.

वेबसाइट पर जल्द ही मालगाड़ी और पार्सलों की स्थिति का पता लगाने के अलावा कई अन्य सेवाएं शुरू होने की उम्मीद है.

प्रार्थना जो सुन ली गयी........

मैंने भगवान से मांगी शक्ति ,                            
उसने दी मुझे कठिनाइयाँ ,
हिम्मत बढाने के लिए .

                                          मैंने भगवान से मांगी बुद्धि ,
                                          उसने दी मुझे दी उलझने ,
                                          सुलझाने के लिए.

मैंने भगवान से माँगा प्यार ,
उसने दिए मुझे दुखी लोग,
निस्स्वार्थ सेवा करने के लिए  .

                                          मैंने भगवान से माँगा वरदान ,
                                          उसने दिए मुझे अवसर ,
                                          उसे प्राप्त करने के लिए .

मैंने भगवान से मांगी हिम्मत ,
उसने मुझे दी परेशानियाँ ,
ऊपर उठने के लिए .

                                         वो मुझे नहीं मिला , जो मैंने माँगा था ,
                                         मुझे वो मिल गया , जो मुझे चाहिए था .

गुरुवार, 30 जून 2011

रात में ही तो मैखाने आबाद होते हैं......

यहाँ मोहब्बत रोज़ बिकती है सड़कों पर,
इश्क  सरे-आम  निलाम  होता  है  !!

जिंदगी रोज़ लगती है दाँव पर और,
मौत  का  नाम  बदनाम   होता है !!

रात में ही तो मैखाने आबाद होते हैं,
सबके हाथों में फिर जाम होता है !!

दौर  चलता है  जब  पीने-पिलाने का तो,
सबकी जुबां पर हमारा ही नाम होता है !!

उनका  तो  काम  ही  है,  बेवफाई  करना,
मेरे दिल फिर तू क्यों बेवजह परेशान होता है !!

पतझर के मौसम में, अकेला माली क्या करे,
बागों को बसाना तो माली का काम होता है !!

'विजय' तू तो अब बिक चूका है बाजारों में ,
देखें  अब  क्या  तेरा  अंजाम  होता  है !!