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The only thing I really wish to do with my life is to inspire someone. I want to touch someone’s life so much that they can genuinely say that if they have never met me then they wouldn’t be the person they are today. I want to save someone; save them from this cold, dark and lonely world. I wish to be someone’s hero, someone that people look up to. I only wish to make a change, even if it’s a small one. I just want to do more than exist.
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

इ ससुरा मोबईल्वा...........

                             कल शाम को बैठे-बठे अचानक हमारा घूमने का मूड बन गया. सोचा की काफी दिन हो गए, पैदल घूमे हुए. क्या है कि इधर कई दिनों से मोटर-साईकिल के साथ हमारा फेविकोल का जोड़ बन गया था. जहाँ भी जाते, मोटर-साईकिल से ही जाते थे .  आस-पास भी कहीं काम होता तो मोटर-साईकिल की पहले याद आती .
                              इसलिए हमने सोचा कि कहीं अपना ख्याल बदल न जाय , सो तुरंत ग्यारह नंबर की बस पकड़ चल दिए बाज़ार की ओर तफरीह करने. अपने आस-पास के वातावरण का आनंद लेते हुए हम टहलते रहे.
                              टहलते-टहलते अभी कुछ ही दूर तक पहुंचे थे कि सामने से मिश्राजी आते हुए दिखाई पड़ गए . मन में हमने सोचा कि चलो आज इन्हीं को खोदा जाय . हमने उन्हें जोर से आवाज लगाई .
                             "अरे मिश्राजी ,प्रणाम , कैसे हैं ?"   
                              मिश्राजी ने हमें देखा तो उनके चेहरे पर घडी के विज्ञापन की तरह , सवा दस , बजने लगे . मिश्राजी हमारे परिचित हैं . काफी मिलनसार एवं मजाकिया  स्वभाव के व्यक्ति हैं . उम्र लगभग पचपन के करीब होगी . हमारे पास आये तो मुस्कुराते हुए पूछने लगे .
                             "काय दादू , कैसन हो ."   और पूछने के बाद आसमान की ओर देखने लगे .
                             हमने पूछा ,"ऊपर क्या देख रहे हैं , आदरणीय ?"
                             "देख  रहा हूँ दादू...... कि आज इ सूरजवा किधर से उगा है . आप और आज पैदल ? गडिया बेच दई का , या आपकी  गड़िया  भी धन्नो के टंगवा के साथ भाग गई ?"
                             हमने भी खीसें नपोरते हुए जवाब दिया,"अरे नहीं भाईसाब , बस  आज यूँ ही घूमने की इच्छा हुई..........तो निकल आय घूमने .......आप सुनाइए , काफी दिनों बाद नज़र आ रहें हैं . कहीं बाहर गए थे क्या ?"
                             "हाँ दादू , तनक इलाहबाद गए रय , गंगा नहाई के लाने . हमरी मिश्राइन कई  दिना से पीछे लगी रई कि गंगा नहाई का है , जई से हमने सोची कि मिश्राइन का गंगा-दर्शन करवाई दई . फिर पता नई कब जाना होत है ." 
                             "अच्छा , तो हो गये गंगा मैया के दर्शन ?"
                             " अरे दर्शन क्या , हम तो बड़े परेशान भय रय उते ."
                             " क्यों मिश्राजी , ऐसी क्या बात हो गयी थी ."
                             "अरे उधर हमरी मिश्रइन खो गयी रई ,"
                             " मिश्राइन खो गयी थी...?...... कुछ समझा नहीं मिश्राजी ?
                             " अरे अब का बतई , वो का भओ कि हम दोनों पहुंचे संगम . नहाना-धोना , दर्शन सब से निपटे तो हमरी पान खाई की इच्छा भई . हमने मिश्राइन से कई की हम आत हैं तनक पान खाई के , जब तक तुम तैयार होवो .इतन बताय के हम आ गए ऑटो-स्टैंड के पास . पान वगैरह खाई के जब हम पहुंचे वापस ,तो देखा की हमरी मिश्राइन गायब . वो क्या था कि तैयार होकर मिश्राइन ने सोची , कि मई पान खाय के लाने ऑटो-स्टैंड तो आया हूँ , और फिर उतनी दूर वापस जाऊंगा , सो खुदई  पहुँच गयी  रइ ऑटो-स्टैंड , सामान उठाई के . अब वो हमका ढुंढत  रइ और हम उका . हम दोनों के पास मोबईल्वा था , मगर ससुरा समय पर उ भी न लगे . काफी देर तक हम दोनों  परेशान होत रहे . वो तो भला हो पांडे जी का , हमरे परिचित , जो हमें उंही मिल गए रहे . हमने  उन्हें अपनी समस्या बताई . उन्होंने हमसे  मोबईल्वा लिया और नंबर देख कर कहेन लगे कि हम बिना जीरो लगाय , नम्बर लगात रहे . वो क्या है कि रोमिंग  में जीरो लगान पड़े न . जब जीरो लगा कर हमने नंबर लगाया तो ससुरा झट से लग गओ . और तब जाकर हमरी मिश्राइन हमें  मिली ."
                               " हमने कहा ," वाह मिश्राजी , तो मोबाईल ने आपको धोखा दिया  और फिर मोबाइल ने ही आपको मिलाया भी ."  
                                "हओ दादू , इ मोबईल्वा भी समय पड़ने पर धोखा देत है , हम तो सचमुच घबराय गय रहे ."
                                इतना कहकर मिश्राजी मुस्कुराने लगे.

रविवार, 31 जुलाई 2011

समस्या का समाधान.....

                                काफी समय पहले की बात है. ब्रह्माजी को एक बार छुट्टी की जरूरत पड़ी. वे विष्णु जी के पास पहुँचे. विष्णुजी ने उन्हें जाने की इजाजत देते हुए कहा की वे अपनी जगह किसी और को नियुक्त करके ही छुट्टी पर जाएँ.  
                               अब ब्रह्माजी ने सोचा कि किसको ढूंढे जो उनकी जगह काम कर सके. आखिर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उन्हें एक ऐसा व्यक्ति मिल ही गया. वह व्यक्ति देखने में ही काफी आलसी लग रहा था. उस समय भी वह सो रहा था. ब्रह्मा जी  ने उसे जगाया और उसे अपनी समस्या बताई. वह व्यक्ति मान गया और पूछा कि उसे करना क्या पड़ेगा.
                               ब्रह्मा जी उसे अपने साथ  एक जगह ले गए, जहाँ बहुत सी मिटटी पड़ी थी. ब्रह्मा जी ने उस व्यक्ति से कहा,"देखो, ये जो मिटटी पड़ी है ना, बस इस मिटटी के तीन-चार पुतले रोज़ बना कर धरती पर फेकना है. और कोई काम नहीं है."
                                उस व्यक्ति ने सोचा कि वाह, काम तो कुछ भी नहीं है. रोज़ सिर्फ तीन-चार पुतले बनाओ और फिर तान के सो जाओ, बहुत बढ़िया. उसने हामी भर दी.
                               उसके हामी भरते ही ब्रह्मा जी उसे अपना कार्यभार सौंप कर चले गए. करीब एक हफ्ते बाद जब वो छुट्टी से वापस लौटे तो देखा कि वहां की सारी मिटटी गायब है, और वह व्यक्ति आराम से सो रहा है. उन्होंने तुरंत उसे जगाया और पूछा,"क्यों यहाँ की सारी मिटटी कहाँ गयी?"
                               उस व्यक्ति ने जवाब दिया,"प्रभुजी, वो तो मैंने सोचा की कौन रोज़-रोज़ तीन-चार पुतले बनाएगा ,इसलिए मैंने एक ही दिन में सारे पुतले बना कर धरती पर फ़ेंक दिए, और बाकी दिन आराम से सो रहा था. मगर आप इतना घबरा क्यों रहे हैं.?"
                              ब्रह्मा जी ने अपना सर पीटते हुआ कहा,"तुमने तो पूरा कचरा कर के धर दिया. सारी मिटटी के पुतले बनाने की क्या जरुरत थी ? अब उधर धरती पर जनसँख्या बढ गयी है. इतने सारे लोगों के खाने-रहने का इंतजाम करना पड़ेगा. और तुमने पुतले बनाये भी तो सब उलटे-सीधे हैं. खुद ही देख लो, किसी का हाथ नहीं है, किसी का पैर नहीं है, किसी का दिमाग नहीं है, सब के सब आड़े तिरछे बने हैं. तुमने तो काम और बढा कर रख दिया है."
                   काफी देर तक ब्रह्मा जी समस्या का हल ढूंढ़ते रहे .जब उनकी समझ में कुछ नहीं आया तो वे पहुँच गए विष्णुजी के पास . उन्हें अपनी समस्या बताई . विष्णु जी भी उनकी समस्या सुन कर सोच में पड़ गए . उन्हें भी कुछ नहीं सुझा.
                           इतने में नारद मुनि का आगमन हुआ. नारदजी के पूछने पर विष्णुजी ने उन्हें भी समस्या सुना दी. समस्या सुनते ही नारदजी ने कहा ," अरे,बस इतनी सी बात है, चलिए मै आपको इस समस्या का हल बताता हूँ . धरती लोक में एक नया सरकारी विभाग चालू करिए और सभी को उसमे भर्ती करवा दीजिये . बस ,  आपकी समस्या ख़त्म ."
                           विष्णुजी और ब्रह्माजी , दोनों को उनकी बात पसंद आती है . धरतीलोक पर एक नया विभाग चालू किया जाता है , जिसका नाम रखा जाता है  "रेलवे  विभाग " और सभी को उसमे भरती कर दिया जाता है. 

सोमवार, 9 मई 2011

यमराज चले क्रिकेट देखने...........

                                विष्णु जी श्रीरसागर में अपनी शैया पर विराजमान थे . वे काफी गहन सोच-विचार में मग्न थे . माथे पर चिंता की लकीरें थी . इतने में नारद जी का आगमन हुआ . 
                                "नारायण-नारायण , प्रणाम प्रभु जी ." 
                                विष्णु जी का ध्यान भंग हुआ . सामने देखा तो नारद मुनि खड़े थे . मंद-मंद मुस्कुराते हुए उन्होंने पूछा,"आइये नारद जी , आइये . कहिये मुनिवर ,कैसे आना हुआ ? कहीं रास्ता तो नहीं भटक गए ? या फिर कोई मुसीबत आन पड़ी है ?"
                               "अरे नहीं प्रभु जी , मै तो बस यूँ ही इधर से गुजर रहा था . सोचा कि आपके दर्शन कर लूँ , इसलिए चला आया . मगर प्रभु जी मैं ये क्या देख रहा हूँ ? आपके माथे पर चिंता कि लकीरें ? सब कुशल मंगल तो है?"
                               "मुनिवर , बात कुछ यूँ है कि अपने यमराज काफी दिनों से गायब हैं . पता नहीं कहाँ चले गए हैं ? कुछ दिनों पहले मेरे पास आये थे छुट्टी मांगने के लिए . कह रहे थे कि पृथ्वी लोक में क्रिकेट का वर्ल्ड कप होने वाला है , उसे देखने जाना है . तब से वे जो गोल हुए हैं तो अभी तक लौट कर नहीं आये हैं . इधर चित्रगुप्त जी का भी बार-बार फोन आ रहा है . "
                              "अरे , चित्रगुप्त जी को क्या परेशानी आ गयी , प्रभु जी ?"
                               "मुनिवर , यमराज जी अपना सारा कार्यभार चित्रगुप्त जी को सौप कर गए हैं . और अब उन्हें भी छुट्टी पर जाना है ,इसलिए वे बार-बार फोन कर रहे हैं ."
                               "प्रभु जी समस्या तो गंभीर है ,मगर ये वर्ल्ड कप तो खत्म हो चूका है . अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था ."
                               "हाँ मुनिवर , आप थोडा पृथ्वी लोक जाकर पता तो लगाइए . यमराज जी ने तो अपना मोबाइल भी बंद कर रखा है . मिल जाएँ तो कहना कि तुरंत मुझसे संपर्क करें ."
                              "जो आज्ञा ,प्रभु जी , आप निश्चिन्त रहें , मैं उन्हें ढूँढ कर लाता हूँ ."
                              नारद मुनि यमराज जी को ढूँढते हुए पृथ्वी लोक पहुंचे . पूरा पृथ्वी लोक घूम लिया लेकिन यमराज जी कहीं नहीं मिले . अंत में थक हार कर वे भारत पहुंचे . वहां देखा कि एक जगह काफी शोर-गुल हो रहा था . मन में कौतुहल जगा . आखिर अपनी आदत से लाचार वे पहुँच गए पता लगाने . जाकर देखा तो वहां एक मैदान में क्रिकट का मैच हो रहा था . सो उन्होंने सोचा कि थोड़ी देर मैच का आनंद लिया जाय . वे बैठने कि जगह ढूँढने लगे . जगह ढूँढते-ढूँढते उनकी नजर यमराज जी पर पड़ी . देखा कि यमराज जी सबसे आगे कि पंक्ति में बैठे थे . मुनिवर ने चैन कि साँस ली कि चलो आखिर मिल ही गए यमराज जी. 
                              नारद जी जाकर यमराज के बगल में खड़े हो गए , और धीरे से उनके कान में कहा," नारायण - नारायण ."
                             यमराज के कानो में जब चिर-परिचित आवाज़ पहुंची तो उन्होंने चौंक कर नारद जी की ओर देखा ,"अरे नारद जी , आप यहाँ ? आप भी आ गए मैच देखने ."
                             "नहीं यमराज महोदय , मैच तो आप ही को मुबारक हो . मै तो आप ही को ढूँढते हुए आया हूँ , आप तो वर्ल्ड कप देखने आये थे जो कि ख़त्म हो चूका है . ये कौन सा मैच चल रहा है ."
                             "अरे मुनिवर ,आप को नहीं मालूम ,ये तो वर्ल्ड कप से भी अच्छा मैच है . इसे  IPL कहते हैं .यह फटाफट वाला क्रिकेट है . इसमें सबसे बढ़िया बात ये है कि यहाँ अप्सराएँ भी नाचती हैं . जब भी चौवा या छक्का लगता है ये नाचना शुरू कर देती हैं . वाह ! बड़ा मज़ा आता है इनका नाच देख कर . मै तो बस इन्ही का नाच देखने के लिए येहाँ रुका हुआ हूँ . वहां स्वर्ग में तो इन्द्र देव की वजह से अप्सराओं का नाच देखने को ही नहीं मिलता . आप भी देखिये ."
                               "यमराज जी वो सब तो ठीक है ,लेकिन वहां प्रभु जी नाराज़ हो रहे हैं . आप को तुरंत याद किया है . और आप का मोबाइल भी तो बंद है ."
                               "मगर मुनिवर मेरा मोबाइल तो चालू है ." 
                                इतना कह कर यमराज ने तुरंत अपना मोबाइल चेक किया . पता लगा कि वाकई मोबाइल बंद है . वे घबरा गए कि अब तो प्रभु जी की डांट खानी पड़ेगी . मन में ये विचार आते ही उन्होंने स्वर्ग लोक की ओर दौड़ लगा दी .
                               इधर नारद जी भी आवाज़ लगाते हुए उनके पीछे चल दिए ," अरे यमराज जी रुकिए ....... मै भी आ रहा हूँ ............"  

सोमवार, 24 जनवरी 2011

सुना है कि कौवा पैदा हुआ है...........!!!

                                 एक व्यक्ति के घर पर लड़का पैदा हुआ . कई लोग उसके घर पर उसे बधाई देने पहुंचे . मिठाई, लड्डू वगैरह खाने के बाद सब वापस लौट गए. बधाई दे कर वापस लौट रहे एक महोदय को रास्ते में दूसरे सज्जन मिले . हाल-चाल पूछने के बाद उन सज्जन ने पहले व्यक्ति से पूछा,"भाई कहाँ से चले आ रहें हैं?," पहले व्यक्ति ने कहा,"अरे, वो अपने पाण्डेय जी है ना, उनके यहाँ लड़का हुआ है. बधाई देने गए थे. लड़का तो अच्छा है मगर रंग थोडा सावंला है."
                                 दुआ सलाम खत्म होने पर वे अपने रास्ते चले गए .  उन दूसरे व्यक्ति को आगे एक तीसरे व्यक्ति मिले . बातों ही बातों में दूसरे व्यक्ति ने तीसरे व्यक्ति से कहा,"अरे सुना है, अपने पाण्डेय जी  के यहाँ लड़का हुआ है ! लड़का तो ठीक है मगर उसका रंग थोडा काला है !,"
                                 वहां से आगे चलने पर उन तीसरे सज्जन को चौथे सज्जन मिले . उनसे बातों ही बातों में तीसरे सज्जन ने कहा," अरे सुना है, अपने पाण्डेय जी के यहाँ लड़का हुआ है ! लड़का तो ठीक है मगर उसका रंग तो बिलकुल  काला है !"
                                तीसरे व्यक्ति की बात चौथे व्यक्ति ने सुनी. आगे उन्हें पांचवा व्यक्ति मिला तो उन्हें चौथे व्यक्ति ने बताया," अरे,सुना है अपने पाण्डेय जी के यहाँ लड़का हुआ है ! लड़का तो ठीक है मगर उसका रंग तो कौवे जैसा  काला है !,"
                                अब भाईसाब, आगे देखिये . उन पांचवे सज्जन को एक छठवें सज्जन मिले तो उन्होंने उसे बताया, "अरे सुना है, अपने पाण्डेय जी के यहाँ कौवा पैदा हुआ है ?".
                                तो जनाब, ऐसा होता हमारे देश में. एक बात कई लोगों के द्वारा जब दूसरों तक पहुँचती है तो उसका पूरा स्वरुप ही बदल चुका होता है .लोगों द्वारा उस बात को तोड़ मरोड़ कर कुछ और बना दिया जाता है . ऐसे ही तो अफवाह फैलती है. बिना किसी बात को ठीक से जाने समझे हम उस बात का गलत मतलब लगा लेते हैं .
                               आईये , हम मिलकर इन अफवाहों को फैलने से रोकें और एक अच्छे नागरिक होने का कर्त्तव्य निभाएं.