मेरे बारे में

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The only thing I really wish to do with my life is to inspire someone. I want to touch someone’s life so much that they can genuinely say that if they have never met me then they wouldn’t be the person they are today. I want to save someone; save them from this cold, dark and lonely world. I wish to be someone’s hero, someone that people look up to. I only wish to make a change, even if it’s a small one. I just want to do more than exist.
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

इ ससुरा मोबईल्वा...........

                             कल शाम को बैठे-बठे अचानक हमारा घूमने का मूड बन गया. सोचा की काफी दिन हो गए, पैदल घूमे हुए. क्या है कि इधर कई दिनों से मोटर-साईकिल के साथ हमारा फेविकोल का जोड़ बन गया था. जहाँ भी जाते, मोटर-साईकिल से ही जाते थे .  आस-पास भी कहीं काम होता तो मोटर-साईकिल की पहले याद आती .
                              इसलिए हमने सोचा कि कहीं अपना ख्याल बदल न जाय , सो तुरंत ग्यारह नंबर की बस पकड़ चल दिए बाज़ार की ओर तफरीह करने. अपने आस-पास के वातावरण का आनंद लेते हुए हम टहलते रहे.
                              टहलते-टहलते अभी कुछ ही दूर तक पहुंचे थे कि सामने से मिश्राजी आते हुए दिखाई पड़ गए . मन में हमने सोचा कि चलो आज इन्हीं को खोदा जाय . हमने उन्हें जोर से आवाज लगाई .
                             "अरे मिश्राजी ,प्रणाम , कैसे हैं ?"   
                              मिश्राजी ने हमें देखा तो उनके चेहरे पर घडी के विज्ञापन की तरह , सवा दस , बजने लगे . मिश्राजी हमारे परिचित हैं . काफी मिलनसार एवं मजाकिया  स्वभाव के व्यक्ति हैं . उम्र लगभग पचपन के करीब होगी . हमारे पास आये तो मुस्कुराते हुए पूछने लगे .
                             "काय दादू , कैसन हो ."   और पूछने के बाद आसमान की ओर देखने लगे .
                             हमने पूछा ,"ऊपर क्या देख रहे हैं , आदरणीय ?"
                             "देख  रहा हूँ दादू...... कि आज इ सूरजवा किधर से उगा है . आप और आज पैदल ? गडिया बेच दई का , या आपकी  गड़िया  भी धन्नो के टंगवा के साथ भाग गई ?"
                             हमने भी खीसें नपोरते हुए जवाब दिया,"अरे नहीं भाईसाब , बस  आज यूँ ही घूमने की इच्छा हुई..........तो निकल आय घूमने .......आप सुनाइए , काफी दिनों बाद नज़र आ रहें हैं . कहीं बाहर गए थे क्या ?"
                             "हाँ दादू , तनक इलाहबाद गए रय , गंगा नहाई के लाने . हमरी मिश्राइन कई  दिना से पीछे लगी रई कि गंगा नहाई का है , जई से हमने सोची कि मिश्राइन का गंगा-दर्शन करवाई दई . फिर पता नई कब जाना होत है ." 
                             "अच्छा , तो हो गये गंगा मैया के दर्शन ?"
                             " अरे दर्शन क्या , हम तो बड़े परेशान भय रय उते ."
                             " क्यों मिश्राजी , ऐसी क्या बात हो गयी थी ."
                             "अरे उधर हमरी मिश्रइन खो गयी रई ,"
                             " मिश्राइन खो गयी थी...?...... कुछ समझा नहीं मिश्राजी ?
                             " अरे अब का बतई , वो का भओ कि हम दोनों पहुंचे संगम . नहाना-धोना , दर्शन सब से निपटे तो हमरी पान खाई की इच्छा भई . हमने मिश्राइन से कई की हम आत हैं तनक पान खाई के , जब तक तुम तैयार होवो .इतन बताय के हम आ गए ऑटो-स्टैंड के पास . पान वगैरह खाई के जब हम पहुंचे वापस ,तो देखा की हमरी मिश्राइन गायब . वो क्या था कि तैयार होकर मिश्राइन ने सोची , कि मई पान खाय के लाने ऑटो-स्टैंड तो आया हूँ , और फिर उतनी दूर वापस जाऊंगा , सो खुदई  पहुँच गयी  रइ ऑटो-स्टैंड , सामान उठाई के . अब वो हमका ढुंढत  रइ और हम उका . हम दोनों के पास मोबईल्वा था , मगर ससुरा समय पर उ भी न लगे . काफी देर तक हम दोनों  परेशान होत रहे . वो तो भला हो पांडे जी का , हमरे परिचित , जो हमें उंही मिल गए रहे . हमने  उन्हें अपनी समस्या बताई . उन्होंने हमसे  मोबईल्वा लिया और नंबर देख कर कहेन लगे कि हम बिना जीरो लगाय , नम्बर लगात रहे . वो क्या है कि रोमिंग  में जीरो लगान पड़े न . जब जीरो लगा कर हमने नंबर लगाया तो ससुरा झट से लग गओ . और तब जाकर हमरी मिश्राइन हमें  मिली ."
                               " हमने कहा ," वाह मिश्राजी , तो मोबाईल ने आपको धोखा दिया  और फिर मोबाइल ने ही आपको मिलाया भी ."  
                                "हओ दादू , इ मोबईल्वा भी समय पड़ने पर धोखा देत है , हम तो सचमुच घबराय गय रहे ."
                                इतना कहकर मिश्राजी मुस्कुराने लगे.

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

रेल को अपना निशाना बनाना छोड़ें


                             आंध्र प्रदेश में पृथक तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आंदोलनरत तेलगांना संयुक्त कार्रवाई समिति ने बुधवार से तीन दिनों तक रेलमार्ग अवरूद्ध करने का फैसला किया है, जिससे 100 से अधिक रेलगाड़ियां स्थगित कर दी गई हैं। गौरतलब है कि पिछली बार 24 और 25 सितम्बर को दो दिनों के लिए रेलमार्ग अवरूद्ध किए गए थे, जिसकी वजह से 72 एक्सप्रेस रेलगाड़ियों और 264 सवारी रेलगाड़ियों को रद्द किया गया था।
                           
                            वाह रे देश के नेता !!!..... अपना मतलब साधने के लिए क्या तुम्हें सिर्फ रेल गाड़ियाँ ही दिखाई देती हैं? सत्ता की रोटियां सेकने के लिए रेल रोको आन्दोलन ही तुम्हें दिखता है ?
                           ये इस देश की विडंबना ही है कि जिसे भी अपनी आवाज बुलंद करनी होती है, वो रेल संचालन अवरुद्ध करने पर उतारू हो जाता है . अभी कुछ समय पहले की बात को ही लीजिये , जब गुर्जर आन्दोलन हुआ था , तब भी इन नेताओं को रेलवे ही की याद आई थी .
                         जिसे देखो अपना गुस्सा रेल पर उतरना शुरू कर देता है.  इन लोगों को ये चिंता नहीं होती कि रेल रोकने से आम जनता को कितनी तकलीफ होती है . इन आंदोलनों कि वजह से रेलवे को कितना नुकसान उठाना पड़ता है .  रेल अगर न चले तो रोज़ इस देश को करोड़ों रुपयों का नुकसान में होता है. ये सारी चीजें इनको नहीं दिखाई देती .  दिखाई देता है तो बस, अपना मतलब . 
                         ऐसे खुदगर्ज़ लोगों से मेरी विनती है कि रेल को अपना निशाना बनाना छोड़ें और कुछ इस देश का ख्याल करें . 

सोमवार, 5 सितंबर 2011

खुबसूरत पंक्तियाँ........

विज्ञानं कहता है "जीभ पे लगी चोट सबसे जल्दी ठीक होती है,
और....ज्ञान कहता है "जीभ से लगी चोट कभी ठीक नहीं होती."

जिंदगी की आधी शिकायतें ऐसे ही ठीक हो जाएँ
अगर लोग......"एक दूसरे के बारे में बोलने की जगह, 
एक दूसरे से बोलना सीख जाएँ ."


हमारा अच्छा समय दुनिया को बताता है कि हम क्या हैं,
और हमारा बुरा समय हमें बताता है कि दुनिया क्या है.......


रास्ते में आने वाले पत्थरों से घबराने की बजाय हिम्मत से उन्हें पार करें,
ये पत्थर मील के पत्थर बन जायेंगे........

सोमवार, 18 जुलाई 2011

सुबह 07.30 बजे की ट्रेन..........

                                   आज वो फिर लेट हो गया था. ट्रेन छूटने में कुछ ही समय बाकी रह गया था. जल्दी-जल्दी स्टैंड में अपनी स्कूटर खड़ी कर, वह स्टेशन की ओर दौड़ पडा. चलते-चलते घडी पर नजर दौड़ाई तो देखा कि सिर्फ एक मिनट रह गया है, ट्रेन छूटने में. उसने सोचा कि आज तो शायद ट्रेन छूट ही जाएगी. जेब से फुर्ती में मोबाइल निकाल कर उसने अपने दोस्त को कॉल लगाई.
                                  "हेलो......सुरेन्द्र....?.... हाँ मै दीपक बोल रहा हूँ.......कहाँ हो.....?"
                                  "हाँ....दीपक......मै ट्रेन में हूँ.....पीछे से तीसरे डिब्बे में......जल्दी आओ ट्रेन स्टार्ट हो गयी है......."
                                  "अरे, स्टार्ट हो गयी.......ऐसा करो, चेन खींच दो........मै स्टेशन के बाहर हूँ.....बस आ रहा हूँ......"
                                  स्टेशन से लगभग आधी बाहर निकल चुकी ट्रेन, चेन खिंचने की वजह से खड़ी हो गयी. क़रीब पाँच मिनट बाद जब ट्रेन फिर चली, तो तब तक दीपक ट्रेन में पहूँच चुका था.
                                  ट्रेन में पहुँच कर उसने राहत की साँस ली. अगले स्टेशन पर उतर कर, वह पीछे से तीसरे डिब्बे में पहुँच गया, जहाँ कि उसका दोस्त बैठा था. दोनों आपस में इधर-उधर की बातें करने लगे. 
                                  यह उनका रोज़ का रुटीन बन गया था. रोज़ सुबह 07.30 बजे की ट्रेन से वे आना-जाना करते थे. पास ही के एक छोटे से शहर में एक प्रायवेट कम्पनी में वे नौकरी करते थे. कई साल हो चुके थे उन्हें, अत: अब तो उन्हें आदत पड़ गयी थी, इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी की.
                                  आज रोज़ के मुकाबले कुछ ज्यादा ही भीड थी ट्रेन में. बातें करते-करते दीपक की नजर एक बुजुर्ग सज्जन पर पडी, जो काफी देर से जगह ना होने के कारण, खडे हुऐ थे. वे काफ़ी बेचैन भी नजर आ रहे थे. उनकी उम्र का लिहाज़ कर दीपक ने उन्हें अपनी सीट पर बैठा लिया. वे बुजुर्ग सज्जन उसे दुआएँ देते हुए बैठ गए. दीपक ने बातें करते हुए उनसे परेशानी का कारण पूछ लिया. 
                                  बुजुर्ग ने कहा,"क्या बताऊँ बेटा, घर से जल्दी में निकला था, स्टेशन के लिए, जब टिकट खरीदने के लिए टिकट-खिड़की पर गया तो वहाँ काफी भीड़ थी. इधर ट्रेन भी आकर खड़ी थी. कही ट्रेन न छूट जाय, इसलिए बिना टिकट लिए ही ट्रेन में बैठ गया हूँ. अब तो यही सोच रहा हूँ कि कोई टी.सी. ना पकड़ ले."
                                  "कोई बात नहीं दादा, आज ट्रेन में कोई टी.सी. नहीं दिखाई दिया मुझे. कोई नहीं पकडेगा, शांति से बैठिये. वैसे आपको उतरना कहाँ है."
                                  "बस अगले स्टेशन पर ही उतरना है मुझे बेटा, लेकिन उतरने के बाद गेट पर भी तो टी.सी. टिकट पुछेगा."
                                  दीपक ने मुस्कुराते हुए कहा,"चलिए दादा, आज आपको गेट से बाहर निकलवाना मेरी जिम्मेदारी है, मुझे भी अगले स्टेशन पर ही उतरना है, बस आप मेरे पीछे-पीछे चलते रहना, कुछ फासले पर, ठीक है?"
                                  कुछ देर बाद ट्रेन अगले स्टेशन रुकी. दीपक ने उन बुजुर्ग व्यक्ति को अपने पीछे आने का इशारा कर गेट की ओर चल दिया.
                                  गेट पर टी.सी. यात्रियों की टिकट चैक कर रहा था. दीपक धीरे-धीरे चलते हुए गेट पर पहुँचा. जैसे ही टी.सी. ने दीपक से टिकट दिखाने को कहा, उसने बाहर की ओर दौड़ लगा दी. टी.सी. ने दीपक को भागते हुए देखा, तो पीछे से आवाज लगायी, और उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ा.
                                  अब टी.सी. के गेट से हटते ही बुजुर्ग सज्जन फुर्ती में गेट से बाहर निकल गए. उधर कुछ दूर पर टी.सी. ने दीपक को पकड़ लिया, और उससे टिकट मांगी. दीपक ने चुपचाप जेब से मंथली सीज़न टिकट निकाल कर टी.सी. के हाथ पर रख दी. टी.सी. ने टिकट चैक करते हुए पूछा,"जब तुम्हारे पास टिकट थी, तो फिर भागे क्यों थे.?"
                                 दीपक ने टिकट को अलट-पलट कर देखते हुए कहा,"भाई साब, इस टिकट पर तो ऐसा कहीं नही लिखा कि भागना मना है."
                                 टी.सी ने दीपक को घूर कर देखा और फिर बडबडाता हुआ गेट की तरफ़ चला गया.दीपक ने मुस्कुरातें हुए बुजुर्ग व्यक्ति की तरफ़ देखा, जो तब तक बाकी लोगों के साथ उनके पास आ चुके थे. वे उसे दुआएँ देने लगे और धन्यवाद देते हुए चले गए.दीपक भी गुंनगुनाता हुआ अपने आफिस की तरफ चल दिया.

बुधवार, 6 जुलाई 2011

प्रार्थना जो सुन ली गयी........

मैंने भगवान से मांगी शक्ति ,                            
उसने दी मुझे कठिनाइयाँ ,
हिम्मत बढाने के लिए .

                                          मैंने भगवान से मांगी बुद्धि ,
                                          उसने दी मुझे दी उलझने ,
                                          सुलझाने के लिए.

मैंने भगवान से माँगा प्यार ,
उसने दिए मुझे दुखी लोग,
निस्स्वार्थ सेवा करने के लिए  .

                                          मैंने भगवान से माँगा वरदान ,
                                          उसने दिए मुझे अवसर ,
                                          उसे प्राप्त करने के लिए .

मैंने भगवान से मांगी हिम्मत ,
उसने मुझे दी परेशानियाँ ,
ऊपर उठने के लिए .

                                         वो मुझे नहीं मिला , जो मैंने माँगा था ,
                                         मुझे वो मिल गया , जो मुझे चाहिए था .

गुरुवार, 23 जून 2011

सुबह की चाय और अख़बार......

                               --बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ किये जा रहे आन्दोलन को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया गया . आधी रात के वक्त लोगों को लाठियों से पीट-पीट कर खदेड़ा गया .
                               --कुछ सालों पहले घटित आरुषी हत्याकांड को शायद अभी कोई भूला नहीं होगा, जब एक मासूम लड़की की कुछ दरिंदों ने बेरहमी से हत्या कर दी थी .
                               --कुछ समय पहले घटित निठारी हत्याकांड को लीजिये , जब दरिंदगी की हद ही हो गयी थी . उपरोक्त सारे घटनाक्रम को मिडिया और सामाजिक संगठनो ने जम कर उछाला .
                               ऐसी कितनी ही घटनाएँ हमारे आस-पास घटती रहती हैं . कहीं किसान आत्महत्या कर रहे हैं . कहीं नव-विवाहिताएं दहेज़ की बलि चढाई जा रही हैं . कहीं चोरी डकैती हो रही हैं . कहीं एक ही परिवार के लोग आपस में लड़-मर रहे हैं . कहीं जमीन-जायदाद के लिए झगडे हो रहे हैं . तो कहीं बाल श्रमिकों का बचपन छीना जा रहा है. 
                               ये सब घटनाएँ अख़बार में मुख्य पृष्ठ पर जगह पा ही जाती हैं . सुबह की गरमा-गरम प्याली के साथ ऐसी घटनाएँ पढ़ी जाती हैं . कोई इन ख़बरों को कड़वी गोली की तरह हजम कर जाता है, मानो संवेदनाएं ही मर गयी हों . किसी का आक्रोश फट पड़ा तो सरकार और समाज को दो-चार अपशब्द कह डालता है . कोई मन मसोस कर रह जाता है . कोई सोचता है की ऐसा नहीं होना चाहिए था . 
                              अख़बार पढते-पढते कानों में श्रीमतीजी कि आवाज आई कि अखबार छोड़ो और चाय पियो, रखे-रखे ठंडी हो रही है . अखबार बाजू में कर देखा तो वाकई चाय ठंडी हो गयी थी. इधर चाय ठंडी हुई और उधर श्रीमतीजी का पारा गरम हो गया. हमने भी अनदेखा कर कहा कि ठंडी चाय पीने में मजा नहीं आएगा, इसे दोबारा गरम कर के ले आओ . हमारी श्रीमतीजी गुस्से में चाय फिर गरम करने चली गयीं . इधर मन में फिर विचार उठ रहे थे .
                          सरकार क्या है ?......समाज क्या है ?........ इन घटनाओं में आये पात्र कौन हैं ?......... क्या वे किसी दुसरे गृह से आये प्राणी हैं ?
                          नहीं, इन सारी घटनाओं के पात्र हम खुद ही हैं. हम ही से मिल कर यह समाज बना है. हम सभी इस के लिए दोषी हैं. हम सही हैं , हमारे सिद्धांत सही हैं, गलती तो दूसरों की है , यह मानसिकता बदलनी होगी. अगर हम खुद ही अनुशासित हो जाएँ, तो इस समाज में क्रन्तिकारी परिवर्तन हो जाएँगे .    

मंगलवार, 21 जून 2011

लोकपाल बिल या लूटपाल बिल........

                                आखिरकार आज फिर लोकपाल ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमिटी की बैठक बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई . सरकार नही चाहती कि एक मजबूत लोकपाल बिल आए . आखिर लोकपाल पर ये हिचकिचाहट क्यों ?...... ये मतभेद क्यों ?........ सरकार चाहती है कि  लोकपाल की नियुक्ति के लिए बनी कमिटी में ज्यादा से ज्यादा पॉलिटिकल लोग होंगे और सांसदों का संसद के अंदर किया गया किसी भी तरह का करप्शन लोकपाल के दायरे से बाहर होगा. ऐसा क्यों ?....... 
                         भ्रष्ट राजनेता एक मजबूत लोकपाल बनाकर अपने पांव मे बेड़ियाँ  कैसे डालेंगे . फिर तो राजनीति उनके लिए घाटे का सौदा होगी . ये बैठकों का दौर तो बस एक नौटंकी का हिस्सा है ? ये राजनेता जानते हैं कि यदि एक मजबूत लोकपाल बिल बन गया तो आधे से अधिक सांसद जेल में होंगे . 
                         सरकार तो एक कठपुतली लोकपाल चाहती है जिसे वो जैसा चाहे नचा ले. जैसे कि एक मदारी अपने बन्दर को नचाता है , वैसा ही कुछ ये सरकार भी सोच रही है. ये सरकार लोकपाल बिल नहीं बल्कि लूटपाल बिल बनाना चाहती है. 
                         और एक विडंबना देखिये कि जिन लोगो के खिलाफ ये विधेयक तैयार होना है, उन्ही लोगों को इसे संसद में पास भी करना है. ऐसे में वो क्यों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे.    
                         हमारा सोचना सही है कि ये बिल कभी तैयार नहीं हो सकता. जब पिछले ४२ सालों से नौ बार संसद में पेश होने के बाद भी यह विधेयक अब तक लंबित है, तब कैसे हम ये आशा कर लें कि इस बार यह पास हो ही जायेगा ?
                         आइये देखें कब तक कछुए की चाल चलता ये लोकपाल (लूटपाल) बिल अपने अंजाम तक पहुँचता है.        

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

मूंगफल्ली वाला...........

                                गाडी अपनी पूरी रफ़्तार से दौड़ रही थी . सुबह का समय था . कुछ यात्री सो रहे थे . कुछ पेपर पढ़ने में मशगूल थे . कुछ आपस में बातें कर रहे थे . कुछ शांत बैठे बाहर का नज़ारा ले रहे थे . 
                                तभी दरवाजे के पास से शोर उठा . सभी का ध्यान उस ओर गया . कौतुहलवश मै भी उस तरफ गया . देखा तो एक पुलिसवाला एक मूंगफल्ली बेचने वाले को पीट रहा था .
                                "क्यों बे साले , ट्रेन में मूंगफल्ली बेचता है , जानता नहीं कि ट्रेन में मूंगफल्ली बेचना जुर्म है , चल , आज तेरे को जेल की हवा खिलाता हूँ . दो दिन जेल में रहेगा तो सारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी ."
                                "अरे साब ,माफ़ कर दो साब........गलती हो गयी साब...........छोड़ दो साब..........जाने दो साब.........आगे से नहीं बेचूंगा साब............"
                                पुलिसवाला उसे मारते जा रहा था साथ में गाली भी देता जा रहा थे . तभी गाड़ी अगले स्टेशन पर रुकी . पुलिसवाला उसे लेकर वहां उतर गया .
                                कुछ देर बाद गाड़ी फिर चलने लगी . सभी फिर अपने में मगन हो गए .करीब पंद्रह मिनट बाद मेरे कानों आवाज आई .
                                "मूंगफल्ली ले लो ........टाइम-पास मूंगफल्ली ..............५-५ रुपये में ..........टाइम-पास मूंगफल्ली............."
                               मैंने सामने देखा तो वही व्यक्ति था जिसे पुलिसवाला पकड़ कर ले गया था . मुझे आश्चर्य हुआ .  मैंने उसे पास बुलाया और पुछा,"तुम्हें तो पुलिसवाला पकड़ कर ले गया था . फिर कैसे छुट गए ,"
                               "अरे साब , ये तो रोज़ की बात है , वो क्या है कि आज पुलिसवाले को पैसे नहीं पहुंचा पाया था न , इसलिए पकड़ा था , दस का नोट उसकी जेब में डाला तब जाके कहीं छोड़ा है ....................मूंगफल्ली ले लो ........टाइम-पास मूंगफल्ली ..............५-५ रुपये में ..........टाइम-पास मूंगफल्ली............."                                    

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

फर्क

                                दोपहर का वक्त था . सूरज सर पर आग उगल रहा था . रास्ते सुनसान पड़े थे . इक्का-दुक्का वाहन सड़क पर नज़र आ रहे थे. मै उस समय एक दूकान पर खड़ा था . चूँकि दुकानदार मेरा मित्र था इसलिए यूँही काफी देर से हम दोनों आपस में गुफ्तगू कर रहे थे . 
                                इतने में एक कार आकर सड़क पर रुकी . एक व्यक्ति कार से बाहर निकला . उसने सफेद रंग का सूट पहन रखा था, आखों में काला चश्मा, चमचमाते हुए काले जूते, और होठों में सिगरेट दबी थी. वह सीधे दुकान पर आया . उसने दुकान से कुछ सामान लिया . पैसे चुकाने के लिए जैसे ही पर्स से पैसे निकाले , कि तभी एक रुपये का सिक्का, उसकी जेब से निकला और लुडकता  हुआ कुछ दूर जा गिरा . वह व्यक्ति शायद बहुत जल्दी में था, इसलिए उसने उस सिक्के को उठाने की कोशिश नहीं की . सामान लेकर वह गाड़ी में जा बैठा और वहां से निकल गया. 
                                वह सिक्का भी वहीँ पड़ा था मानो सोच रहा हो कि कैसा मेरा मालिक है , इसे मेरी कोई चिंता ही नहीं है. अभी उस व्यक्ति को गए हुए दो-चार मिनट ही हुए थे कि एक दूसरा व्यक्ति वहां आया . शक्ल से काफी गरीब लग रहा था . मैले से कपडे , सर पे गमछा बांधे हुए , कोई मजदूर था शायद.  
                                आते ही उसकी नज़र उस सिक्के पर पड़ी .  नज़रें चारों तरफ घूमी, एक पैर आगे बढ़ा, और सिक्का धीरे से पैर के नीचे छिप गया. तभी सीधा हाथ पैर खुजलाने के लिए नीचे गया और सिक्का हथेली के अंदर.  अब उस व्यक्ति ने वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी, शायद सोचा हो कि अगर सिक्के के मालिक ने देख लिया तो सिक्का हाथ से चला जायेगा. 
                                सिक्के ने भी सोचा होगा कि चलो कोई तो मिला जिसने मेरा मोल पहचाना .

रविवार, 27 मार्च 2011

वो पहली मुलाकात.........

                                   हमारे एक परिचित हैं, नाम है मिश्राजी , मगर शायद ही कोई उन्हें इस नाम से संबोधित करता होगा. सभी उन्हें भगवन कहकर बुलाते हैं. उम्र के मामले में, उन्होंने पचपन का आंकड़ा तो पार कर ही लिया होगा. बातें हमेशा मीठी-मीठी करते हैं. काफी मिलनसार और मजाकिया स्वाभाव के हैं. 
                                   एक दिन मिल गए हमें. दुनिया जहान की बातें होने लगी. बातों-बातों में शादी-ब्याह की बातें चली तो कहने लगे,"क्या जमाना आ गया है. आजकल के बच्चे तो शादी के पहले ही साथ में घूमना-फिरना शुरू कर देते हैं . हमारे ज़माने में तो शादी के पहले मिलना जुलना तो दूर की बात थी , चेहरा तक नहीं देखने  को मिलता था,"
                                  हमने भी उन्हें छेड़ते हुए कहा,"भगवन कुछ अपनी सुनाओ, आपकी शादी कब हुई थी ?"
                                  अब क्या था , उन्हें श्रोता मिल गया, तो शुरू हो गए अपनी पहली मुलाकात के बारे में बताने.
                                  कहने लगे,"भाई , हमरी शादी जब भइ थी तो हमार उमर राही पन्द्रह साल और हमरी   मिश्राइन रइ  बारह साल की . अब हम का बताई ,सारी शादी भइ गयी मगर हमें उनका चेहरा देखन को नाहीं मिला. शादी के बाद बारात बिना दुल्हन के वापस आ गयी .  दुल्हन को बाद में ,जब गौने की रस्म होती है ना , लड़का-लड़की के अठारह साल के होने पर, तब लाया जाता है ."
                                 "शादी को दो साल बीत गए . एक दिन हमने सोची , कि कछु भी हो , एक बार तो किसी तरह मिश्राइन से मुलाकात की जाय .सो हम पहुँच गए उका गाँव .वहां अपने एक रिश्तेदार के इहाँ पहुंचे . बातों-बातों में उन्हें मन की बात बताई .वो बोले कि चलो हम दूर से तुम्हें बताय दई ,आगे तुम जानो ."
                                 "अब हम उनके साथ पहुंचे नदिया किनारे , जहाँ वो कपडा धोवत रइ . हमरे रिश्तेदार ने हमें दूर से बता दिया कि वही है हमरी मिश्राइन . अब हम थोड़ी देर तक तो उन्हें निहारत रहे , फिर बात करने की सोची . सो हम मिश्राइन के पास गए , और कहा कि जरा तनक साबुन दई दो ,नहाने के लिए, हम घर से लाना भूल गए हैं . मिश्राइन ने हमें घूर के देखा और कहा कि शर्म नहीं आवत है , साबुन मांगते हुए . वो सामने दुकान है ,जाकर खरीद लो ."
                               "अब हम कुछ कहते , उसके पहले ही एक छोटा बच्चा जो वहीँ  पर खड़ा हमें बड़े गौर से देख रहा था , कहने लगा कि अरे फूफाजी आ गए , फूफाजी आ गए . हमने लड़के को डांटा , और कहा कि चल हट ,कछु भी बोलता है , मै तेरा फूफा-वुफा नाही हूँ . हमारा इतना कहना था कि मिश्राइन तुरंत समझ गयीं कि हम कौन हैं . उसने तुरंत सारे कपडे-बाल्टी समेटी और दौड़ लगा दी अपने घर की तरफ ."
                               "अब हमने सोची कि हमरी पोल तो खुलन गईन है ,सो हम भी तुरंत अपने रिश्तेदार के घर पहुंचे और तैयार हो कर जैसन बहार निकले तो सामने हमारे साले साब खड़े थे . वो बोलने लगे कि अरे जीजा ,आप आये और बताया भी नहीं , और चुपचाप जा भी रहे हैं . चलिए घर माँ ने बुलाया है . हमने बहाना  बनाया कि ऐसे ही तनक काम से आये थे , अब जा रहे हैं . मगर साले साब भी कहाँ मानने वाले थे ,सो ले गए पकड़ कर अपने घर .खूब खातिरदारी भई हमारी वा दिन . तो ऐसन थी हमरी पहली मुलाकात ."
                               इतना कह कर मिश्राजी मुस्कुराने लगे . हमने भी कहा ,"वाह मिश्राजी, क्या कहने हैं , आप तो बड़े छुपे रुस्तम निकले ."